गुलज़ार शायरी

gulzar poetry

तमाशा करती है मेरी जिंदगी,

गजब ये है कि तालियां अपने बजाते हैं!

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मजबूरिया ओढ़ के निकलता हूं  घर से आजकल ,

वरना शौक तो आज भी है बारिशों में भीगनें का …..

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तकिये पर अश्क़ देख कर सवाल सौ उठे…

हँसकर हमने कह दिया ख्वाबों के दाग हैं….

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कुछ इस तरह खूबसूरत रिश्ते टूट जाया करते हैं,

दिल भर जाता है तो लोग रूठ जाया करते हैं….!

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वफा की उम्मीद ना करो उन लोगों से,

जो मिलते हैं किसी और से  होते है किसी और के…..!

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अपने वजूद पर इतना मत इतरा ऐ जिंदगी,

वो तो मौत है जो तुझे मोहलत दिए जा रही है….!